गुरुवार, अप्रैल 25, 2013

जीत के लिए क्‍या जरूरी है?

भारतीय सेना चीन की सेना के सामने टिक पाएगी या हमें एक बार फिर 1962 देखना होगा?

जीत के लिए क्‍या जरूरी है?
कुशल सेनापति? कारगर रणनीति? आधुनिक सोच? परिस्थितियों का सही विश्‍लेषण? जीत की जिद? स्‍वयं का मूल्‍यांकन? दुश्‍मन का आकलन?

इनमें हमारे पास क्‍या है? अगर हमारे पास उपरोक्‍त सभी सवालों का ईमानदार जवाब है तो हम जीत सकते हैं. केवल जोश और बयान देने भर से कुछ नहीं होने वाला. उदाहरण कई हैं...

1. विश्व का सर्वाधिक कुशल सेनापति नेपोलियन अपनी जिद में रूस के जार की बात भूल गया. रूस के जार का कथन, 'मेरे दो सेनापति, जनवरी और फरवरी, मुझे कभी धोखा नहीं देते' कोई हल्‍की बात नहीं थी. नेपोलियन इन बातों पर ध्‍यान नहीं दिया, दुश्‍मन का मूल्‍यांकन करने और परिस्थितियों को समझने में चूक गया और जिसका परिणाम उसे सेना की भीषण तबाही और शर्मनाक वापसी के रूप में चुकानी पड़ी. नेपोलियन एक कारगर रणनीति बनाने वाला तथा समय से आगे की सोच रखने वाला, जोशीला और जीत की जिद पर सवार कई सफल अभियानों को अंजाम देने वाला एक कुशल सेनापति था. लेकिन परिस्थितियों का और स्‍वयं का सही आकलन नहीं कर पाया. और इस तरह हरदम जीतने वाला सर्वाधिक कुशल सेनापति हार गया.

2. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी हिटलर की जिद ने अपनी सेना को रूसी सर्दी में तबाह कर दिया. हिटलर भी परिस्थितियों का सही मूल्‍यांकन नहीं कर पाया और मात खा गया. पराजय के रूप में परिणाम इतिहास में दर्ज है.

दलित बस्‍ती में ही सफाई करने क्‍यों पहुंच जाते हैं नेता...

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